Why Hare Krishna Mahamantra in Kaliyuga?

कली संतराणा उपनिषद भगवान ब्रह्मा और उनके पुत्र नारद के बीच एक वार्तालाप बताता है। द्वापर युग के अंत में, महान ऋषि नारद अपने पिता भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे पूछा: “हम कलयुग (झगड़े और पाखंड के वर्तमान युग) के प्रभावों को कैसे दूर करेंगे?” भगवान ब्रह्मा ने उत्तर दिया: “भगवान नारायण के पवित्र नामों का जप कली के युग में मुक्ति का एकमात्र साधन है।”

In Srimad Bhagavatam (Canto 12 Chapter 3 Text 51 - 52)

कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान्गुण:। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तबन्ध: परं ब्रजेत्॥

kaler doṣa-nidhe rājann,
asti hy eko mahān guṇaḥ,
kīrtanād eva kṛṣṇasya,
mukta-saṅgaḥ paraṁ vrajet,

Meaning: राजन्! दोषों के भंडार कलियुग में यहीं एक महान् गुण है कि इस समय श्रीकृष्ण का कीर्तनमात्र करने से मनुष्य बन्धमुक्त हो परमपद को प्राप्त हो जाता है।

My dear King, although Kali-yuga is an ocean of faults, there is still one good quality about this age: Simply by chanting the Hare Kṛṣṇa mahā-mantra, one can become free from material bondage and be promoted to the transcendental kingdom.

In Vishnu Purana (6.2.17), and also in the Padma Purana (Uttara-khanda 72.25):

ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदापनेति दतापनेति कलौ संकी‌र्त्य केशवम्॥

dhyayan krte yajan,
yajnais- tretayam dvapare,
rcayan yadapnoti tadapnoti,
kalau samkirtaya kesavam.

Meaning: सत्ययुग में भगवान् का ध्यान, त्रेता में यज्ञों द्वारा यजन और द्वापर में उनका पूजन करके मनुष्य जिस फल को पाता है, उसे वह कलियुग में केशव का कीर्तनमात्र करके प्राप्त कर लेता है।

Whatever is achieved by meditation in Satya-yuga, by the performance of sacrifice in Treta-yuga, and by the worship of Lord Krsna’s lotus feet in Dvapara-yuga is obtained in the age of Kali simply by glorifying the name of Lord Kesava.

In Brhan-Naradiya Purana (38.97):

हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥

harer nama harer nama
harer namaiva kevalam
kalau nasty eva nasty eva
nasty eva gatir anyatha

Meaning: श्रीहरि का नाम ही, नाम ही, नाम ही मेरा जीवन है। कलियुग में इसके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है। कलियुग में भगवन्नाम , गुण लीलादि संकीर्त्तन ही भगवत्प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है । भुक्ति,मुक्ति की कामनाओँ से रहित हो कर हरि-गुरु का रुपध्यान करते हुए,उनसे अत्यन्त दीनतापुर्वक,रोकर,दिव्य प्रेम की याचना करने से ही अन्तःकरण शुद्ध होगा । 

Harinama, Harinama, Harinama is the only and foremost means to achieve emancipation. There is no other way, no other way, no other way in this age of Kali.

In Kali Santarana Upanishad

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
इति षोडषकं नाम्नं कलि कल्मष नाशनं ।
नातः परतरोपायः सर्व वेदेषु दृश्यते ।

hare krishna hare krishna krishna krishna hare hare
hare rama hare rama rama rama hare hare
iti shodashakam namnam kali-kalmasha-nashanam
natah parataropayah sarva-vedesu drsyate

Meaning:बत्तीस सिलेबल्स से बना ये सोलह नाम, कलियुग के बुरे प्रभावों का मुकाबला करने का एकमात्र साधन है। सभी वैदिक साहित्य के माध्यम से खोज करने के बाद, कोई भी इस युग के लिए धर्म का रास्ता नहीं खोज सकता है, इसलिए हरे कृष्ण मंत्र का जाप करना चाहिए।

These sixteen names composed of thirty-two syllables are the only means of counteracting the evil effects of the Kali-yuga. After searching through all the Vedic literature, one cannot find a method of religion for this age, so sublime as the chanting of the Hare Krishna mantra.